तापसी पन्नू की फिल्म ‘अस्सी’ इन दिनों अपने गंभीर विषय और दमदार संवादों को लेकर चर्चा में है। फिल्म के एक सीन में पुलिस इंस्पेक्टर आरोपी से पूछता है— “रामधारी सिंह दिनकर ने क्या लिखा है?” आरोपी जवाब देता है— “वो झूठ बोल रहा है, मैंने कुछ गलत नहीं किया।” इसी तरह अमृता प्रीतम जैसे लेखकों के नाम का भी जिक्र होता है। यह संवाद सिर्फ साहित्यिक ज्ञान की परीक्षा नहीं, बल्कि आरोपी की मानसिकता को उजागर करने का तरीका है।
Ramdhari Singh Dinkar अन्याय के खिलाफ स्वर और आत्मसम्मान के कवि माने जाते हैं। वहीं Amrita Pritam ने स्त्री की पीड़ा और संवेदनाओं को अपनी रचनाओं में गहराई से उकेरा है। फिल्म में इन नामों का इस्तेमाल यह दिखाने के लिए किया गया है कि साहित्य जिन मूल्यों की बात करता है, क्या समाज वास्तव में उन्हें समझता और अपनाता है?
सीन का मूल संदेश यही है कि किताबों के नाम जानना और उनके विचारों को आत्मसात करना अलग बातें हैं। आरोपी का जवाब उसकी संवेदनहीनता को उजागर करता है, जबकि साहित्य का संदर्भ समाज के नैतिक आईने की तरह सामने आता है।
‘अस्सी’ का यह संवाद दर्शकों को सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम सच में उन मूल्यों पर खरे उतरते हैं, जिनका हवाला देते हैं।

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