फिल्ममेकर विशाल भारद्वाज अपनी आने वाली फिल्म ‘ओ’ रोमियो’ को लेकर एक बार फिर चर्चा में हैं। फिल्म के ट्रेलर लॉन्च के दौरान जब सिनेमा में गालियों और हिंसा के इस्तेमाल पर सवाल उठाए गए, तो विशाल भारद्वाज ने इस बहस पर खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने साफ कहा कि फिल्मों में दिखाई जाने वाली भाषा और हिंसा समाज की ही परछाई होती है, न कि किसी फिल्ममेकर की निजी पसंद।
विशाल भारद्वाज के मुताबिक, अगर समाज में रफ भाषा मौजूद है, तो सिनेमा उससे आंख नहीं चुरा सकता। उन्होंने कहा, “हम समाज में जो देखते और सुनते हैं, वही कहानियों में आता है। अगर किरदार उस माहौल से आते हैं, तो उनकी भाषा भी वैसी ही होगी।” उन्होंने यह भी साफ किया कि ‘ओ’ रोमियो’ का मूल भाव रोमांटिक है, लेकिन कहानी की सच्चाई दिखाने के लिए कुछ सख्त संवाद जरूरी थे।
फिल्ममेकर ने आगे कहा कि हर फिल्म को एक ही नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। अगर कहानी अंडरबेली या रियलिस्टिक दुनिया से जुड़ी है, तो उसे शालीन शब्दों में दिखाना झूठ होगा। विशाल भारद्वाज का मानना है कि सिनेमा का काम समाज को आईना दिखाना है, न कि उसे सजाकर पेश करना।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि दर्शकों के पास आज विकल्प हैं—अगर किसी को किसी तरह का कंटेंट पसंद नहीं आता, तो वे उसे न देखें। फिल्ममेकर्स पर सेंसरशिप का अनावश्यक दबाव रचनात्मकता को नुकसान पहुंचाता है।
‘ओ’ रोमियो को लेकर विशाल भारद्वाज का यह बयान एक बार फिर सिनेमा, अभिव्यक्ति की आज़ादी और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच चल रही बहस को तेज करता नजर आ रहा है।
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